कल हो ना हो

December 24, 2006

आज एक बार फ़िर सुरज को उगता देखो
और चान्द को चान्दनी रात मे जागता देखो
क्या पता कल ये धरती
चान्द और सुरज हो ना हो

आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो

आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो

आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो

बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो

आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो

आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो

क्या पता
कल हो ना हो ….

5 Responses to “कल हो ना हो”

  1. Shrish Says:

    आज चिट्ठा लिख लो, कल हो ना हो। :)

    आपके ब्लॉग के शीर्षक को ठीक कीजिए –> पूर्णतया हिन्दी ब्लॉग

  2. Anjali Says:

    हम तुम्हारे हैं सनम//कल हो ना हो//कभी ख़ुशी कभी ग़म

  3. gopal kumar Says:

    मैं होश में था तो फिर उसपे मर गया कैसे
    ये जहर मेरे लहू में उतर गया कैसे

    कुछ उसके दिल में लगावट जरूर थी वरना
    वो मेरा हाथ दबाकर गुजर गया कैसे

    जरूर उसके तसव्वुर की राहत होगी
    नशे में था तो मैं अपने ही घर गया कैसे

    जिसे भुलाये कई साल हो गये कलीम
    मैं आज उसकी गली से गुजर गया कैसे

  4. Ajay Shekawath Says:

    Han

  5. jayu Says:

    i like this poem very much

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